श्री गुरु रविदास चालीसा
दोहा
काशी में प्रकट भए, गुरु भक्त रविदास।
माँ कर्मा, राहू पिता, दादा हरिनन्द खास॥
सम्बत विक्रमी नृपति, चौदह सौ तैंतीस।
माघ शुक्ला पूर्णिमा, रवि उगत प्रभात॥
चौपाई
जय गुरु रविदास दीन दयाला, कर विश्वास रटूँ नित माला॥
चहुँ ओर मेरे घोर अन्धेरा, तेरे बिना गुरु कोई ना मेरा॥
अगम अपार तुम्हारी माया, तुम्हारा पार कोई नहीं पाया॥
पंथ वरण तुम्हारा ना कोई, नाम रटे से मुक्ति होई॥
दीनन के गुरु नाथ कहाओ, सकल दुखों से मुझे बचाओ॥
कहाँ तक वर्णूँ महिमा तुम्हारी, ऐसी ना सतगुरु बुद्धि हमारी॥
माता-पिता ने भक्ति कमाई, भक्त भए हरिनन्द सुखदाई॥
चतरकोर प्रिय तिनकी नारी, उन्होंने कीन्ही भक्ति भारी॥
धौलागिरि पर आसन मारा, मुनि सनन्दन वचन उचारा॥
तै हरिनन्द करी मम सेवा, राहू सुत होगा सुखदेवा॥
आशीर्वाद ले घर को धाए, भक्ति प्रताप राहू सुत पाए॥
भक्ति में राहू चित दीना, सागर तिर जाय तप कीना॥
रेवतप्रज्ञा से शिक्षा पाई, तन मन से हरि भक्ति कमाई॥
भक्ति प्रताप हुई नभ बानी, तुम्हारा सुत होगा ब्रह्मज्ञानी॥
हार मान दुर्जन भग जावै, उनको कोई जीत न पावै॥
ऐसी भक्ति प्रचण्ड दिखलावे, पोप पाखण्डी निकट न आवे॥
हो प्रसन्न लौट घर आए, विमल होय नित हरिगुण गाए॥
कुछ दिन पीछे प्रकटे रविदासा, पूर्ण भई भक्त की आशा॥
कर्मा मात हरिगुण गाए, प्रसन्न हो अति द्रव्य लुटाए॥
सुर नर मुनि दर्शन को आए, भए आनन्द पुष्प बरसाए॥
बालकपन में गुरु भक्ति धारी, हुए दयाल सतगुरु स्वामी॥
मात-पिता मिल मता उपायो, ब्याह करन की तुरन्त ठहरायो॥
ब्याह से रूठ गए रविदासा, मुझको सतगुरु की आशा॥
परमानन्द गुरु किए सदाचारी, उनसे सीखी विद्या सारी॥
प्रथम विजय गंगा पर पाई, पोप पाखण्डी दिए हराई॥
नर-नारी दर्शन को धाए, सबको परम उपदेश सुनाए॥
सबको सतगुरु ने एक बनाया, एक ही ब्रह्म सकल घट छाया॥
ना कोई ऊँचा ना नीचा भाई, सबका एक पिता और माई॥
दूजा पर्व पड़ा एक भारी, नहाने गए बहुत नर-नारी॥
योगवती और झाली रानी, चेली भई मन आनन्द मानी॥
देखत चकित भए अभिमानी, चेली भई नीच की रानी॥
यज्ञ किया झाली ने भारी, जीमन गए बहुत नर-नारी॥
गुरु रविदास वहाँ सन्मुख पाए, पोप घृणा से नहीं भोजन खाए॥
पोप कहे नहीं भोजन खावे, सिद्धा दो हम अलग बनावें॥
झाली गुरु रविदास बुलाए, उन्हें सूखे सिद्धे दिलवाएँ॥
सिद्धा ले ब्राह्मण हरषाए, अपना भोजन आप बनाए॥
सन्तों का कीना अपमाना, ब्राह्मण बने ब्रह्म नहीं जाना॥
अपनी पंगत अलग लगाई, अनगिनत दिए रविदास दिखाई॥
देखत चकित भए अभिमानी, मगन भई अति झाली रानी॥
सबने जय-जयकार मनाया, सब नर-नारी जीम घर आए॥
गंगा स्नान विप्र एक जायो, गुरु रविदास प्रसाद पठायो॥
प्रसाद दियो गंगा माता को, जल में नहीं डारियो या को॥
मम अरदास माता से कहना, हाथ बढ़ाए ले तब दे देना॥
विप्र ने जा जल में वचन सुनायो, ये प्रसाद रविदास पठायो॥
हाथ बढ़ाय गंगा ने लिया, स्वर्ण का एक कंगन दिया॥
हर्षित गंगा बोली बानी, ये कंगन रविदास को देना॥
विप्र के मन में पाप समाया, मार्ग छोड़ कुमार्ग धाया॥
विप्र कहे भया जान का रासा, जित देखे बैठे रविदासा॥
आँख बचाय विप्र घर आया, कंगन राजभवन पहुँचाया॥
रानी ने जब कंगन पाया, दूजे हेतु हुक्म फरमाया॥
राजा से यूँ बोली बानी, प्राणनाथ सुनिए मम बानी॥
या तो दूजा कंगन पाऊँ, नहीं मिले तो प्राण गवाऊँ॥
राजा ने ब्राह्मण बुलवाया, तो पै कंगन कहाँ से आया॥
ब्राह्मण हृदय बीच भय खाया, ये कंगन रेती में पाया॥
या तो दूजा कंगन लाओ, नहीं तो सजा मौत की पाओ॥
राजा ने ब्राह्मण धमकाया, डर से पण्डित सन्त पै आया॥
राजा को संग लेकर धाया, गुरु रविदास की कुटी पै आया॥
भूप कहे यदि गुरु तपधारी, परचा दे ओ करे सेवा तुम्हारी॥
कहे रविदास होय मन चंगा, दूजा कंगन देगी गंगा॥
भक्त ने सुरति गंगा पै लाई, प्रकट भई कुंडी में आई॥
भाँति-भाँति कंगन दिखलाए, चकित भए पण्डित शर्माए॥
भूप ने गुरु को शीश नवाया, सबने जय-जयकार मनाया॥
विप्रों के मन में कुमति समाई, हरि की मूर्ति जल में फिंकवाई॥
कठिन पेज विप्रों ने लाई, जाकी पत राखै रघुराई॥
जाकी मूर्ति जल पै तर जावै, काँधे रखकर नगर डुलावै॥
गुरु रविदास ने हरिगुण गाए, डूबे काट पाषाण तिराए॥
कौतुक लखे सकल नर-नारी, गुरु ने पाई विजय करारी॥
मीरा और कमाली बाईं, चेली भई मन में हरषाईं॥
मीरा जी ने यज्ञ रचाई, सब पै न्योता दिया पहुँचाई॥
जीमन पोप बैठ गए न्यारे, अनगिनत रविदास निहारे॥
विप्रों ने कीना हल्ला भारी, बन गए नीच जनेऊधारी॥
राजसभा में गुरु बुलाए, काँधा चीर जनेऊ पाए॥
गुरु रविदास कह समझाई, एक ही राम रमा सब माही॥
सबका एक बनावन हारा, पंथ वरण से सतगुरु न्यारा॥
ऐसी विचित्र गुरु लीला थारी, कहाँ तक वर्णे बुद्धि हमारी॥
जो चालीसा गुरु रविदास का गावै, सब सुख भोग परम पद पावै॥
सतगुरु समनदास कह समझावै, नहीं फिर वो चौरासी में आवै॥
समापन
जय सतगुरु रविदास॥
जय सतगुरु समनदास॥
जय-जय गुरु रविदास महाराज की जय॥
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